मौंन
Sunday, September 20, 2015
Tuesday, November 9, 2010
प्रकाश
मन से संचित कर भाव
शुभकामनायों की यह भेंट लाई हूँ ।
शब्दों के तेल से मार्जित कर
मंगल्कामनायों के धूप दीप लाइ हूँ ।
प्रभु करे -हम सब के जीवन में
प्रकाश के दिए जलते रहें ,जलते रहें ।
अनंत प्रार्थनायों के साथ
सब को शुभ दीपावली ।
शुभकामनायों की यह भेंट लाई हूँ ।
शब्दों के तेल से मार्जित कर
मंगल्कामनायों के धूप दीप लाइ हूँ ।
प्रभु करे -हम सब के जीवन में
प्रकाश के दिए जलते रहें ,जलते रहें ।
अनंत प्रार्थनायों के साथ
सब को शुभ दीपावली ।
Tuesday, October 5, 2010
इन्दरधनुषी जाल
सारा जीवन क्या किया ----?
मकड़ी की तरह
जाल बुने हैं -----
आँखें बंद करती हूँ
तो क्या देखती हूँ ----
अनगिनत जाल हैं
रेशमी धागों के
रंग बिरंगे जाल
इन्दर धनुषी जाल
करूँ तो करूँ क्या
सब मेरे ही तो तो बुने है ,
हिलूं तो हिलूं कैंसे
उलझ जायेंगे या फिर
डरती हूँ टूट जायेंगे
सोच तो सोच जरा
इस नश्वर जग में
स्थिर क्या -------
यह दर क्यूँ और किस से
आँखे बंद कर
गहरे उत्तर ,अपनी दुनिया में
वहां शांति का सागर बहता है ॥
मकड़ी की तरह
जाल बुने हैं -----
आँखें बंद करती हूँ
तो क्या देखती हूँ ----
अनगिनत जाल हैं
रेशमी धागों के
रंग बिरंगे जाल
इन्दर धनुषी जाल
करूँ तो करूँ क्या
सब मेरे ही तो तो बुने है ,
हिलूं तो हिलूं कैंसे
उलझ जायेंगे या फिर
डरती हूँ टूट जायेंगे
सोच तो सोच जरा
इस नश्वर जग में
स्थिर क्या -------
यह दर क्यूँ और किस से
आँखे बंद कर
गहरे उत्तर ,अपनी दुनिया में
वहां शांति का सागर बहता है ॥
Friday, September 17, 2010
बेनाम भाव
अध्यातम का दंभ
इच्छायों की गठरी
कर्मों की काली रातें
राह के पत्थर
कदम बढ़ें तो कैंसे बढ़ें ।
एक और मूक अँधियारा
बड़े शहरों की
बड़ी बड़ी बतियों
से चौंधियाई आँखें
भला कुछ देखें तो कैंसे देखें ।
जग का इतना शोर
त्राहि त्राहि करता जन मानस
भीतर से अनबुझी
प्यास की बगावत
किसी की भला सुने तो कैंसे सुने ।
यह कोई सत्य या
सत्य से भागने का बहाना
या मन की कोई चाल
इस मन से ही बेगाने
मन की उलझन सुलझे तो कैंसे सुलझे ॥
इच्छायों की गठरी
कर्मों की काली रातें
राह के पत्थर
कदम बढ़ें तो कैंसे बढ़ें ।
एक और मूक अँधियारा
बड़े शहरों की
बड़ी बड़ी बतियों
से चौंधियाई आँखें
भला कुछ देखें तो कैंसे देखें ।
जग का इतना शोर
त्राहि त्राहि करता जन मानस
भीतर से अनबुझी
प्यास की बगावत
किसी की भला सुने तो कैंसे सुने ।
यह कोई सत्य या
सत्य से भागने का बहाना
या मन की कोई चाल
इस मन से ही बेगाने
मन की उलझन सुलझे तो कैंसे सुलझे ॥
Tuesday, August 24, 2010
सब कविता प्रेमियों को मेरा स्नेह पूर्ण अभिनन्दन । बहुत दिनों बाद एक छोटी सी कोशिश ------- कभी ऐसा भी होता है
हम जीवन नहीं जीते
जीवन हमें जीता है ।
और तब यह वक्त
हमें कठपुतली सा
नाच नचाता है ।
जब हम जागते हैं
मानों एक लम्बा
सपना देखा हो ।
वर्षों बीत जाते हैं
हम वहीँ खड़े होते हैं
जहाँ पहले खड़े थे ।
वही प्रशन हाथों में
लेकर मूक से खड़े हैं
मैं आखिर हूँ कौन ?
हम जीवन नहीं जीते
जीवन हमें जीता है ।
और तब यह वक्त
हमें कठपुतली सा
नाच नचाता है ।
जब हम जागते हैं
मानों एक लम्बा
सपना देखा हो ।
वर्षों बीत जाते हैं
हम वहीँ खड़े होते हैं
जहाँ पहले खड़े थे ।
वही प्रशन हाथों में
लेकर मूक से खड़े हैं
मैं आखिर हूँ कौन ?
Saturday, January 23, 2010
मौन
दुनिया की यह हलचल
अब शोर सा लगता है
भीतर से आ रही आवाज़ का
स्वर मधुर सा लगता है ।
मुझे मेरे मौन में खो जाने दो
कि बज रहा वहां सितार बड़ी लय से
मुझे आवाज़ न दो
कोई कुछ कह रहा बात मेरी रूह की तह से ।
तुम्हें क्या समझाऊँ क्या सुनाऊँ
कोई स्वर नहीं कोई भाषा नहीं इसकी
यह तो एहसास है ,अनुभूति है
यों आया और यों गया कोई पकड़ नहीं इसकी ॥
२५ दिसम्बर कि पोस्ट भी देखें
अब शोर सा लगता है
भीतर से आ रही आवाज़ का
स्वर मधुर सा लगता है ।
मुझे मेरे मौन में खो जाने दो
कि बज रहा वहां सितार बड़ी लय से
मुझे आवाज़ न दो
कोई कुछ कह रहा बात मेरी रूह की तह से ।
तुम्हें क्या समझाऊँ क्या सुनाऊँ
कोई स्वर नहीं कोई भाषा नहीं इसकी
यह तो एहसास है ,अनुभूति है
यों आया और यों गया कोई पकड़ नहीं इसकी ॥
२५ दिसम्बर कि पोस्ट भी देखें
Thursday, January 7, 2010
नव वर्ष की सबको हार्दिक शुभकामनायें ,प्रभु कृपा आने वाले हर दिन को मंगलमय करे ।
अपने मन से एक अनुरोध ------
जाग मनवा जाग तू सोया सोया जाग
नए वर्ष की नई किरण का सुन आह्वान
जाग मनवा जाग --------
इस जग का तू मुसाफिर ही तो है
अपनी यात्रा की मंजिल को पहचान
जाग मनवा जाग --------
कहीं से आया ,न जाने कहाँ जाना
आज के जीवन की गति को पहचान
जाग मनवा जाग ----------
यों ही खा पीकर पशुवत चला जाएगा
या कभी चिंतन को भी देगा मान
जाग मनवा जाग ---------
आख़िर मैं हूँ कौन ,क्यूँ आया यहाँ
मानव है ,इन प्रश्नों पर दे कुछ ध्यान
जाग मनवा जाग -----------
जग क्या करे क्या सोचे तुझे क्या लेना
कर प्रयोग अपने विवेक का ओ बुद्धिमान
जाग मनवा जाग -----------
जिस दिन जाग गया तू बन्दे
हर सुबह नई सुबह देगी नई पहचान
जाग मनवा जाग तू सोया सोया जाग ॥
अपने मन से एक अनुरोध ------
जाग मनवा जाग तू सोया सोया जाग
नए वर्ष की नई किरण का सुन आह्वान
जाग मनवा जाग --------
इस जग का तू मुसाफिर ही तो है
अपनी यात्रा की मंजिल को पहचान
जाग मनवा जाग --------
कहीं से आया ,न जाने कहाँ जाना
आज के जीवन की गति को पहचान
जाग मनवा जाग ----------
यों ही खा पीकर पशुवत चला जाएगा
या कभी चिंतन को भी देगा मान
जाग मनवा जाग ---------
आख़िर मैं हूँ कौन ,क्यूँ आया यहाँ
मानव है ,इन प्रश्नों पर दे कुछ ध्यान
जाग मनवा जाग -----------
जग क्या करे क्या सोचे तुझे क्या लेना
कर प्रयोग अपने विवेक का ओ बुद्धिमान
जाग मनवा जाग -----------
जिस दिन जाग गया तू बन्दे
हर सुबह नई सुबह देगी नई पहचान
जाग मनवा जाग तू सोया सोया जाग ॥
Friday, December 25, 2009
क्या नाम दूँ इस भाव को ----?
ऐंसा अक्सर होता है
कहीं खो जाती हूँ
मानो किसी गहरी -
कहीं खो जाती हूँ
मानो किसी गहरी -
नींद में सो जाती हूँ
या यों कहो -जगत प्रपंच की
रिश्तों की भीड़ में खो जाती हूँ
जीवन के नित नियम में
उलझ कर रह जाती हूँ
जानती हूँ ,कितनी सौतेली हो
जाती हूँ अपने आप से
लावारिस भटकने देती हूँ इसे
इसका क्रंदन सुनाई तो देता है
पर न जाने कहाँ होती हूँ
बस जीवन यों ही
चार सीढ़ी कभी चढ़
दो नीचे उत्तर और कभी
दो चढ़ और चार उतर
रिश्तों की भीड़ में खो जाती हूँ
जीवन के नित नियम में
उलझ कर रह जाती हूँ
जानती हूँ ,कितनी सौतेली हो
जाती हूँ अपने आप से
लावारिस भटकने देती हूँ इसे
इसका क्रंदन सुनाई तो देता है
पर न जाने कहाँ होती हूँ
बस जीवन यों ही
चार सीढ़ी कभी चढ़
दो नीचे उत्तर और कभी
दो चढ़ और चार उतर
का खेल तमाशा है
क्यूँ हम धीरे धीरे
सीढ़ीदूर सीढ़ी चढ़ना सीखते नहीं
सीढ़ीदूर सीढ़ी चढ़ना सीखते नहीं
Monday, November 9, 2009
आज बहुत पुरानी डायरी हाथ आई ,पुरानी वह कवितायें तो फिर कभी सुनाऊँ गी ,पर उसे पढने के बाद जो लिखा वह सुनाती हूँ ------
ऐय ज़िन्दगी बस अब और सवाल न पूछ
हम क्यूँ भटके ,समय गवाया क्यूँ
पीछे मुड़ कर अपने क़दमों को देख
सोच ज़रा
सफर कितनी दूर का कर आया तू ?
तेरे खोने पाने ,हंसने रोने की गिनती
की फुर्सत किसे ,वह तेरी कमाई थी
तू जिमेवार अपने कर्मों का
वह तेरी ,तेरी अपनी लड़ाई थी
मनन कर
जीवन से सीखा क्या ,क्या सिखा आया कुछ ?
आज जो किया ,कमाया है
कल मौज से खर्चेगा
जिस लक्ष की राह पर चला है
वहीं जा कर कल पहुंचेगा
पहचान कर
दूसरों को दिया क्या ,ख़ुद क्या लाया तू ?
कभी समझ अगर बोध से
तो जीवन सुंदर सरल कहानी है
अभिनय भी तेरा है
तेरी कहानी तेरी अपनी ज़ुबानी है
गौर कर
अभिनय का आनंद कितना ले आया तू ?
चला कितना ,कोई महत्त्व नहीं
मगर चला कहाँ तक ,जरूरी है
पीछे छोड़ा कचरा कितना
जोड़ गुणों का जो खजाना ,ज़रूरी है
चिंतन कर
क्या फिर लौट आने की तयारी कर आया तू ?
ऐय ज़िन्दगी बस अब और सवाल न पूछ
हम क्यूँ भटके ,समय गवाया क्यूँ
पीछे मुड़ कर अपने क़दमों को देख
सोच ज़रा
सफर कितनी दूर का कर आया तू ?
तेरे खोने पाने ,हंसने रोने की गिनती
की फुर्सत किसे ,वह तेरी कमाई थी
तू जिमेवार अपने कर्मों का
वह तेरी ,तेरी अपनी लड़ाई थी
मनन कर
जीवन से सीखा क्या ,क्या सिखा आया कुछ ?
आज जो किया ,कमाया है
कल मौज से खर्चेगा
जिस लक्ष की राह पर चला है
वहीं जा कर कल पहुंचेगा
पहचान कर
दूसरों को दिया क्या ,ख़ुद क्या लाया तू ?
कभी समझ अगर बोध से
तो जीवन सुंदर सरल कहानी है
अभिनय भी तेरा है
तेरी कहानी तेरी अपनी ज़ुबानी है
गौर कर
अभिनय का आनंद कितना ले आया तू ?
चला कितना ,कोई महत्त्व नहीं
मगर चला कहाँ तक ,जरूरी है
पीछे छोड़ा कचरा कितना
जोड़ गुणों का जो खजाना ,ज़रूरी है
चिंतन कर
क्या फिर लौट आने की तयारी कर आया तू ?
Saturday, October 31, 2009
एक ख्याल
जो यह दर्द न होता
कष्ट न होते
कोई दुःख न होता
तो क्या होता
इन्सान इक माटी का पुतला होता ।
फिर अपने भी कहाँ होते
उनके दिए ज़ख्म भी न होते
आंसूं भी न होते
तो क्या होता
इन्सान पागल सा हरदम हँसता होता ।
समाज के बनाये यह फ़र्ज़ न होते
सृष्टि के अपने नियम न होते
इन्सान अपने कर्मों से
बंधा न होता
हर कोई अपने को खुदा समझता होता ।
फिर प्यार कहाँ होता
नफरत का संसार कहाँ होता
अनुभव भी न होते
तो क्या होता
इन्सान बस साँस लेती मूर्त होता ।
कष्ट न होते
कोई दुःख न होता
तो क्या होता
इन्सान इक माटी का पुतला होता ।
फिर अपने भी कहाँ होते
उनके दिए ज़ख्म भी न होते
आंसूं भी न होते
तो क्या होता
इन्सान पागल सा हरदम हँसता होता ।
समाज के बनाये यह फ़र्ज़ न होते
सृष्टि के अपने नियम न होते
इन्सान अपने कर्मों से
बंधा न होता
हर कोई अपने को खुदा समझता होता ।
फिर प्यार कहाँ होता
नफरत का संसार कहाँ होता
अनुभव भी न होते
तो क्या होता
इन्सान बस साँस लेती मूर्त होता ।
Sunday, October 25, 2009
बेचैन होता कौन
वक्त की चालों से दुखी कौन
जोवक्त की ताकत को समझता नहीं
इधर से उधर बेचैनहोता कौन
जो अपने अंतस को ही समझता नहीं ।
ज़िन्दगी भर पूर जीने का नाम
जो मिला है वह तेरा है
जो नहीं मिला वह तेरा था ही नहीं
खोने पाने से क्यूँ ऊपर तू उठता नहीं ।
इस षण भंगुर जगत का पाना खोना
उतना ही जितना उसे तू देख ले
आँखे बंद कर ,अंधकार की ओरसे
खोल प्रकाश में सब कुछ चमकता यहीं ।
आँखे खोल ,उनकी ओरडेख
जिन्होनें कभी कुछ पाया ही नहीं
और तो और पेट भर कभी खाया ही नहीं
उनसे नज़र मिला ,देख प्रभु कैंसे दीखता नहीं ।
बाहें फैलाये जग बुला रहा है
कान तो खोल ,आवाज़ तो सुन
आँखें तो खोल ,पुकार तो सुन
सच्चा साधक तो वक्त के आगे झुकता नहीं ।
जोवक्त की ताकत को समझता नहीं
इधर से उधर बेचैनहोता कौन
जो अपने अंतस को ही समझता नहीं ।
ज़िन्दगी भर पूर जीने का नाम
जो मिला है वह तेरा है
जो नहीं मिला वह तेरा था ही नहीं
खोने पाने से क्यूँ ऊपर तू उठता नहीं ।
इस षण भंगुर जगत का पाना खोना
उतना ही जितना उसे तू देख ले
आँखे बंद कर ,अंधकार की ओरसे
खोल प्रकाश में सब कुछ चमकता यहीं ।
आँखे खोल ,उनकी ओरडेख
जिन्होनें कभी कुछ पाया ही नहीं
और तो और पेट भर कभी खाया ही नहीं
उनसे नज़र मिला ,देख प्रभु कैंसे दीखता नहीं ।
बाहें फैलाये जग बुला रहा है
कान तो खोल ,आवाज़ तो सुन
आँखें तो खोल ,पुकार तो सुन
सच्चा साधक तो वक्त के आगे झुकता नहीं ।
Saturday, October 24, 2009
वक्त की चालों से दुखी कौन
जो वक्त की ताकत को समझता नहीं
इधर से उधर बेचैन कौन
जो वक्त की ताकत को समझता नहीं
इधर से उधर बेचैन कौन
जो अपने अंतस को ही समझता नहीं ।
ज़िन्दगी भरपूर जीने का नाम
जो मिला है वह तेरा है
जो नहीं मिला वह तेरा था ही नहीं
खोने पाने से क्यूँ ऊपर तू उठता नहीं ।
इस षण भंगुर जगत का पाना खोना
उतना ही जितना उसे तू देख ले
आँखें बंद कर अंधकार से
खोल प्रकाश में सब कुछ चमकता यहीं ।
आँखें बंद कर अंधकार से
खोल प्रकाश में सब कुछ चमकता यहीं ।
आँखें खोल ,उनको देख
जिन्होंने कभी कुछ पाया ही नहीं
जिन्होंने कभी कुछ पाया ही नहीं
और तो और पेट भरकभी खाया ही नहीं
उन से नज़र मिला ,देख प्रभु कैंसे दीखता नहीं ।
बाहें फैला ,ये जग बुला रहा है
कान तो खोल ,आवाज़ तो सुन
Tuesday, October 6, 2009
सभी ब्लॉग साथिओं को मेरा अभिनन्दन । विजय दशमी ,कड़वा-चौथ की सबको मुबारक। aआज सूरज जब ढल रहा था और मुझे बहुत भा रहा था की अचानक मुझसे बात करने लगा ,सोच यह बातचीत आपको भी सुना दूँ ------
कभी छत्त पर खडे हो कर
ढलते सूरज की लाली को देखा है
मौन हो उसको सुना ?
वह तुमसे कुछ बोलती है
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है
क्या पहना क्या ओदा
क्या संवारा ,क्या बरबाद किया
क्या पाया और कहाँ गवांया
लिया कितना और दिया क्या
यह जिंदगी दिए वक्त का जवाब मांगती है ।
यह सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
यह सोनेचांदी के सिक्कों
की कोई गिनती नहीं
नहीं बैंक बलेंस की शीत
वक्त का यह मापदंड ,तुम्हारे
समय की रेत पर छोडे क़दमों की गहराई नापती है ,
यह जिंदगी दिए वक्त का जवाब मांगती है ।
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
तुम्हारे कपड़े गहनों की
गिनती कीमत कल क्या होगी
कपडों के रंग ढंग बदले होंगे
रुपये की कीमत न जाने कहाँ होगी
आनेवाली पीढी तुम्हारी उपलब्धियों को आंकती है ,
यह जिंदगी दिए वक्त का जवाब मांगती है ।
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
तुम भले ही इसको मत सुनो
चादर ओढ़ सो जायो
यह सारी रात जाग कर
तुम्हारी बुनी चादर के तार तार खोलती है
तुम्हारे ही धागों से तुम्हारी सुबह सवांरती है
यह ज़िन्दगी दिए वक्त का हिसाब मांगती है ।
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
कभी छत्त पर खडे हो कर
ढलते सूरज की लाली को देखा है
मौन हो उसको सुना ?
वह तुमसे कुछ बोलती है
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है
क्या पहना क्या ओदा
क्या संवारा ,क्या बरबाद किया
क्या पाया और कहाँ गवांया
लिया कितना और दिया क्या
यह जिंदगी दिए वक्त का जवाब मांगती है ।
यह सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
यह सोनेचांदी के सिक्कों
की कोई गिनती नहीं
नहीं बैंक बलेंस की शीत
वक्त का यह मापदंड ,तुम्हारे
समय की रेत पर छोडे क़दमों की गहराई नापती है ,
यह जिंदगी दिए वक्त का जवाब मांगती है ।
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
तुम्हारे कपड़े गहनों की
गिनती कीमत कल क्या होगी
कपडों के रंग ढंग बदले होंगे
रुपये की कीमत न जाने कहाँ होगी
आनेवाली पीढी तुम्हारी उपलब्धियों को आंकती है ,
यह जिंदगी दिए वक्त का जवाब मांगती है ।
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
तुम भले ही इसको मत सुनो
चादर ओढ़ सो जायो
यह सारी रात जाग कर
तुम्हारी बुनी चादर के तार तार खोलती है
तुम्हारे ही धागों से तुम्हारी सुबह सवांरती है
यह ज़िन्दगी दिए वक्त का हिसाब मांगती है ।
सारे दिन के दिए प्रकाश का हिसाब मांगती है ॥
Saturday, September 19, 2009
देश विदेश
प्रभु की दी इस ,जीवन यात्रा में
आते हैं कई पड़ाव
कभी यहाँ कभी वहां
कहीं धूपकहीं छावं
हमें सब हाल में खुश रहना है ।
कभी वतन की माटी की महक
कभी अपनों से दूर होने का विषाद
यह तो उसकी सृष्टि के
सुख दुखों का वाद विवाद
ले बीच की राह सम रहना है ।
यह भी खूब सजी महफिल
सिलसिला सुनने और सुनाने का
एक मौन आह्वान प्रेम का
एक मूक आन्दोलन स्नेह का
जिसे बस चलते ही रहना है ।
इसमें न शोर ऊंची आवाजों का
न भीड़ न रास्ते बंद हैं
खुला आसमान फैली ज़मी
सब बोलने को स्वतंत्र हैं
जब जी चाहे सुन लेना है
न देश की सीमायों और
वीजायों के बंधन
न संपादकों की किट किट
जब चाहो कर लो अभिनन्दन
जी चाहे तो मौन हो जाना है ।
विज्ञानं की इन खोजों में
जब इंसान की भावनाए मिल जाएँगी
बनेगी तब नई दुनिया
जिसमे देश धर्म की सीमायें मिट जाएँगी
इस कारवां से जुड़ते चले जाना है ।
आते हैं कई पड़ाव
कभी यहाँ कभी वहां
कहीं धूपकहीं छावं
हमें सब हाल में खुश रहना है ।
कभी वतन की माटी की महक
कभी अपनों से दूर होने का विषाद
यह तो उसकी सृष्टि के
सुख दुखों का वाद विवाद
ले बीच की राह सम रहना है ।
यह भी खूब सजी महफिल
सिलसिला सुनने और सुनाने का
एक मौन आह्वान प्रेम का
एक मूक आन्दोलन स्नेह का
जिसे बस चलते ही रहना है ।
इसमें न शोर ऊंची आवाजों का
न भीड़ न रास्ते बंद हैं
खुला आसमान फैली ज़मी
सब बोलने को स्वतंत्र हैं
जब जी चाहे सुन लेना है
न देश की सीमायों और
वीजायों के बंधन
न संपादकों की किट किट
जब चाहो कर लो अभिनन्दन
जी चाहे तो मौन हो जाना है ।
विज्ञानं की इन खोजों में
जब इंसान की भावनाए मिल जाएँगी
बनेगी तब नई दुनिया
जिसमे देश धर्म की सीमायें मिट जाएँगी
इस कारवां से जुड़ते चले जाना है ।
Sunday, September 6, 2009
सपने
पुरानी डायरी के पन्नो से -------------
सपने जीवन में कई रंग भरते है ,
सपने सच हो जायें तो इससे भला क्या है
और अगर सच न हुए तो रोना क्यूँ
सपने आख़िर सपने ही तो हैं ।
अपने जीवन में प्यार के रंग भरते हैं ,
प्यार दो और प्यार मिले ,फिर कहना ही क्या है
अगर नफरत भरे झोली में तो रोना क्यूँ
कहने को फिर भी कोई अपने तो हैं ॥
संतों के दर्शन जीवन में अपनी जगह रखते हैं
यों बिना प्रयास के कभी मिल जाएँ तो कहना क्या है
न मिलें तो भी चाह बनाये रखने में बुरा क्या
मिलें तो जीवन का रुख ही बदल देते हैं ।
पूजन जीवन में आनंद के रंग भरते हैं
गुरु मिले तो साधना का पथ मुश्किल हो कितना
चलते रहो मंजिल दुसाध्य हो क्यूँ न
गुरु भव सागर से पार करवा ही देते हैं ॥
सपने जीवन में कई रंग भरते है ,
सपने सच हो जायें तो इससे भला क्या है
और अगर सच न हुए तो रोना क्यूँ
सपने आख़िर सपने ही तो हैं ।
अपने जीवन में प्यार के रंग भरते हैं ,
प्यार दो और प्यार मिले ,फिर कहना ही क्या है
अगर नफरत भरे झोली में तो रोना क्यूँ
कहने को फिर भी कोई अपने तो हैं ॥
संतों के दर्शन जीवन में अपनी जगह रखते हैं
यों बिना प्रयास के कभी मिल जाएँ तो कहना क्या है
न मिलें तो भी चाह बनाये रखने में बुरा क्या
मिलें तो जीवन का रुख ही बदल देते हैं ।
पूजन जीवन में आनंद के रंग भरते हैं
गुरु मिले तो साधना का पथ मुश्किल हो कितना
चलते रहो मंजिल दुसाध्य हो क्यूँ न
गुरु भव सागर से पार करवा ही देते हैं ॥
Friday, August 28, 2009
उम्र का तकाज़ा
अजीब बात है
चोट है चोट का दर्द भी है
पर होता वह एहसास नहीं ।
वक्त वक्त की बात है
शीत लहर है हवा सर्द भीहै
मगर पहले सा आभास नहीं ।
रिश्ते नाते हैं
प्यार वही हैनफरत की गर्द वही है
अब भावनायों का उठता तूफ़ान नहीं ।
वही दिन वही रात है
साँस चल रही धड़कन भी है
पर जीना का वह उल्लास नहीं ॥
चोट है चोट का दर्द भी है
पर होता वह एहसास नहीं ।
वक्त वक्त की बात है
शीत लहर है हवा सर्द भीहै
मगर पहले सा आभास नहीं ।
रिश्ते नाते हैं
प्यार वही हैनफरत की गर्द वही है
अब भावनायों का उठता तूफ़ान नहीं ।
वही दिन वही रात है
साँस चल रही धड़कन भी है
पर जीना का वह उल्लास नहीं ॥
Thursday, August 27, 2009
तुम कहाँ हो
यह जीवन अपने ही कर्मों का खजाना
वक्त बलवान है उस से डर कर रहना
भाग्य का ज़ोर है सब का यह कहना
फिर तुम कहाँ हो -तुम्हारी दया क्या है ?
दुःख सुख की यह सारी लीला
तीन गुणों से बना यह संसार है
उस में भला कैसे सम हो रहना
फिर तुम कहाँ हो -तुम्हारी प्रार्थना क्या है ?
सच है प्रार्थना ,प्रार्थना है
भीख नहीं ,वोह प्यार है
पर दर्द को भला कैसे सहना
फिर तुम कहाँ हो-तुम्हारी कृपा क्या है ?
बोध कहाँ से कैसे आए
हम अपनी अज्ञानता से बेजार हुए
तुम्हारी सृष्टि के नियम समझ न आए
फिर तुम कहाँ हो -तुम्हारा राज़ क्या है ?
वक्त बलवान है उस से डर कर रहना
भाग्य का ज़ोर है सब का यह कहना
फिर तुम कहाँ हो -तुम्हारी दया क्या है ?
दुःख सुख की यह सारी लीला
तीन गुणों से बना यह संसार है
उस में भला कैसे सम हो रहना
फिर तुम कहाँ हो -तुम्हारी प्रार्थना क्या है ?
सच है प्रार्थना ,प्रार्थना है
भीख नहीं ,वोह प्यार है
पर दर्द को भला कैसे सहना
फिर तुम कहाँ हो-तुम्हारी कृपा क्या है ?
बोध कहाँ से कैसे आए
हम अपनी अज्ञानता से बेजार हुए
तुम्हारी सृष्टि के नियम समझ न आए
फिर तुम कहाँ हो -तुम्हारा राज़ क्या है ?
Monday, August 17, 2009
ओ निराशयों की काली घतायों --
ओ निराशायो की काली घटायों
जायो कहीं बियाबान में जा बरसो
तुम यहाँ घिरी उमड़ी
बस इसी में संतुष्ट हो जायो ,
ओ निराशयों की काली घटायों ---
यहाँ मेरे गुरु की कृपा बरसती है
तुम्हें कोई थाह न मिलेगी
तुम कहीं दूर जा निकलो
अपना अस्तित्व तो बचाओ
ओ निराशायो --------
माना की यह मन अस्थिर है
दुखी है थोड़ा अशांत भी
यह मेरे प्रभु की परीक्षाएं
यों न उलझो ,ज़ोर न आजमाओ
ओ निराशायो -----------
यह मन आखिर मन ही तो है
कभी भटकेगा ,रोयेगा भी कभी
यह सब तो जीवन की सीडियां
तुम यों न गरजो न हमको डरायो
ओ निराशायो
सोना चमकेगा जब आग से निकलेगा
साधना किसी आग से कम नहीं
झुलसेगा जो साधक , व् ही दमकेगा
जायो ,जायो तुम यह आग न बुझायो
ओ निराशायो की काली घटायो ॥
जायो कहीं बियाबान में जा बरसो
तुम यहाँ घिरी उमड़ी
बस इसी में संतुष्ट हो जायो ,
ओ निराशयों की काली घटायों ---
यहाँ मेरे गुरु की कृपा बरसती है
तुम्हें कोई थाह न मिलेगी
तुम कहीं दूर जा निकलो
अपना अस्तित्व तो बचाओ
ओ निराशायो --------
माना की यह मन अस्थिर है
दुखी है थोड़ा अशांत भी
यह मेरे प्रभु की परीक्षाएं
यों न उलझो ,ज़ोर न आजमाओ
ओ निराशायो -----------
यह मन आखिर मन ही तो है
कभी भटकेगा ,रोयेगा भी कभी
यह सब तो जीवन की सीडियां
तुम यों न गरजो न हमको डरायो
ओ निराशायो
सोना चमकेगा जब आग से निकलेगा
साधना किसी आग से कम नहीं
झुलसेगा जो साधक , व् ही दमकेगा
जायो ,जायो तुम यह आग न बुझायो
ओ निराशायो की काली घटायो ॥
Wednesday, August 12, 2009
मेरा साया मुझ पर हँसता है
रात के वीराने में ,मन होता है उदास
जी चाहता है ,जी भर के रो लूँ
मगर रो नहीं पाती हूँ __
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है ।
जीवन की यात्रा के दर्शन मंथन में
सीखा सुख दुःख एक समान
फिर यह रोने की चाह
क्या कोई साधक की पहचान
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है
कहीं दूर अंधेरे मोड़ के भ्रम से
जब मन डरता है
पर घबरा नहीं पाती हूँ
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है ।
जिस कल पर तेरा ज़ोर नहीं
आने वाले पल का ज्ञान नहीं ,भान नहीं
उसको लेकर शंकित होना
बोध का तो नाम नहीं
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है
मन सपनों में कभी खोये ,भर जाता है उल्लास
जी चाहता है ,जी भर के झूमूं
मगर झूम नहीं पाती हूँ
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है
ढलती संध्या की इस काया में
गति कहाँ ,अवरोध कहाँ
स्नेह की बहती इस नदिया में
भला पाना क्या और खोना कहाँ
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है ॥
जी चाहता है ,जी भर के रो लूँ
मगर रो नहीं पाती हूँ __
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है ।
जीवन की यात्रा के दर्शन मंथन में
सीखा सुख दुःख एक समान
फिर यह रोने की चाह
क्या कोई साधक की पहचान
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है
कहीं दूर अंधेरे मोड़ के भ्रम से
जब मन डरता है
पर घबरा नहीं पाती हूँ
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है ।
जिस कल पर तेरा ज़ोर नहीं
आने वाले पल का ज्ञान नहीं ,भान नहीं
उसको लेकर शंकित होना
बोध का तो नाम नहीं
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है
मन सपनों में कभी खोये ,भर जाता है उल्लास
जी चाहता है ,जी भर के झूमूं
मगर झूम नहीं पाती हूँ
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है
ढलती संध्या की इस काया में
गति कहाँ ,अवरोध कहाँ
स्नेह की बहती इस नदिया में
भला पाना क्या और खोना कहाँ
कि मेरा साया मुझ पर हँसता है ॥
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