Tuesday, October 5, 2010

इन्दरधनुषी जाल

सारा जीवन क्या किया ----?
मकड़ी की तरह
जाल बुने हैं -----
आँखें बंद करती हूँ
तो क्या देखती हूँ ----
अनगिनत जाल हैं
रेशमी धागों के
रंग बिरंगे जाल
इन्दर धनुषी जाल
करूँ तो करूँ क्या
सब मेरे ही तो तो बुने है ,
हिलूं तो हिलूं कैंसे
उलझ जायेंगे या फिर
डरती हूँ टूट जायेंगे
सोच तो सोच जरा
इस नश्वर जग में
स्थिर क्या -------
यह दर क्यूँ और किस से
आँखे बंद कर
गहरे उत्तर ,अपनी दुनिया में
वहां शांति का सागर बहता है ॥

8 comments:

  1. बहुत सुंदर और उत्तम भाव लिए हुए.... खूबसूरत रचना......

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  2. सारा जीवन क्या किया ----?
    मकड़ी की तरह
    जाल बुने हैं -----

    sochne par majboor kar diya aapne.sach hai,zale bunne ke alawa aur kya kiya?

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  3. ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

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  4. सच कहा है अंततः अपने अंदर ही शांति मिलती है ... तृष्णा के मॅकड़ जाल में आशाएँ उलझती चली जाती हैं ... बहुत आध्यात्मिक लिखा है ...

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  5. आपकी टिपण्णी के लिए बहुत बहुत शुक्रिया!
    बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने शानदार रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  6. ..इन्दर धनुषी जाल
    करूँ तो करूँ क्या
    सब मेरे ही तो तो बुने है..
    ..यही उलझन है..इसी को सुलझाना है।

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  7. दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

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